Monday, July 18, 2011

The write up for Dainik Bhaskar

Being brought up in Central India, I remember starting my mornings with DAINIK BHASKAR, one of the most circulated Hindi Dailies in India. And after so many years, when I was asked by an Editor friend to write a Sunday Special News Feature on Lifestyle for Dainik Bhaskar's front page - I couldn't resist the offer and here's the piece that appeared in more than 60+ Editions of Dainik Bhaskar all over India. Trust me, it gives a high to see your name and write up appearing on the first page of a news paper you've grown up with. Click on the image to read the write up:

My Documentary Chitrakatha featured in FHM July 2001 Issue

I remember hiding issues of FHM from my parents as it always used to feature scantily clad girls. Thankfully the Indian edition of the magazine is a bit considerate when it comes to such things (besides our starlets don't really believe in exposing for the Desi version that much). But this month came with a FHM Flaunting moment for me - FHM India featured a one page article on my Documentary Chitrakatha, for those who are unaware about the project can catch up with us on our Facebook page.
Meanwhile, enjoy the article here, click on the image for a readable size.

Wednesday, June 15, 2011

Love U...Mr. Kalakaar

I was associated with Rajshri Production's latest release Love U Mr. Kalakaar as an Art Consultant/ Cartoon Artist. Tusshar Kapoor plays a cartoonist in the movie, and I provided all the cartoons that were there in the movie.

I was asked by Mr.Triambak Sharma, Editor Cartoon Watch to do a small write up on my experience about the movie sometime back. The write up appeared in the latest issue of the magazine.

Here it goes:

त्र्यम्बक भैय्या ने जब मुझे जब अपने लव यू मि. कलाकार को ले कर हुए अनुभव के बारे में लिखने को कहा तो मुझे सोचते हुए कुंग फु पांडा के कछुआ मास्टर उगवे की वो लाइन याद आई जिसमें वो कहते हैं One Often Meets His Destiny On The Road He Takes To Avoid It ! कई बार आपका प्रारब्ध आपको उस राह में मिलता है जो आपने उससे बचने के लिए ली होती है. हालांकि मुझे कार्टूनिंग से हमेशा एक लगाव रहा है और मैंने अपने कार्टूनिंग जीवन की शुरुआत कार्टून वाच के साथ १९९७ में की थी पर एक समय के बाद मैं प्रोफेशनल कार्टूनिंग से ऊब चुका था, और वैसे भी मुझे पोलिटिकल या सोशल कार्टूनिंग से ज्यादा लगाव कॉमिक कार्टूनिंग से रहा है. एक लम्बे अरसे तक गोथम कॉमिक्स, बंगलोर में काम करते करते अचानक एक दिन मन कार्टूनिंग से ऐसा उचटा कि मैंने अपने ब्रुश और इंक को एक बक्से में पैक किया और निकल पड़ा कुछ अलग करने...मैंने कार्टूनिंग छोड़ दी थी पर कार्टूनिंग ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. रेडियो करते समय मैं यदा कदा अपने स्टेशन के Ads लिए कुछ कार्टून्स बना दिया करता था, कभी किसी दोस्त की Ad Agencies के लिए कार्टून्स बनाता था तो कभी अपने खुद के जॉब एप्लीकेशन को कार्टूनी रंग में रंग देता था...प्रोफेशनल कार्टूनिंग से दूर रह कर भी कार्टूनिंग बदस्तूर जारी थी हाँ मैंने खुद को कार्टूनिस्ट कहना बंद कर दिया था. ऐसे में मुंबई आने पर जब मेरी मुलाकात मनस्वी भाई से हुई तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था एक दिन वो मुझे वापस घसीट कर ड्राईंग बोर्ड तक ले आयेंगे.
मैंने उनको अपने कुछ पुराने कार्टून्स दिखाए जो कि उनको बड़े पसंद आये बाद में जैसा कि महानगरों में होता है वो अपने काम में रम गए और मैं अपने काम में. कार्टूनिंग अब तकरीबन बिलकुल बंद थी पर हाँ डिस्नी टीवी के लिए काम करते हुए फिर ऐसा कुछ काम आया जिसके लिए ज़रूरत हुई किसी कार्टून डिज़ाईनर की और मैंने एक बार फिर दो चार कार्टून बनाये और डिस्नी छोड़ कर निकल गया पुणे बिग एनीमेशन...जहां मेरे चारों और इतने ज़बरदस्त कार्टूनिस्ट थे कि मुझे कभी कुछ भी draw करने ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई, फिर भी मैं शौकिया तौर पर एक रोज़ एक Wacom Tablet खरीद लाया कि चलो कभी ज़िन्दगी में वक़्त मिला तो एक बार फिर कार्टून बनायेंगे. मगर न वक़्त मिला न कार्टून बने बेचारी टेबलेट टेबल पर रखी धूल खाती रही और मैंने तो तब तक शर्मसार हो कर खुद को कार्टूनिस्ट कहना भी बंद कर डाला था. अब हम एनीमेशन राईटर और assistant preproduction director थे...ऐसे में एक रोज़ मन को कुछ ऐसी खुरापात चढ़ी कि हमने अपनी जॉब से इस्तीफ़ा दे दिया ये सोच कर कि कुछ अलग करना है अब. इस बीच मनस्वी भाई से एक दो बार फोन पर बात हुई थी और उन्होंने कहा था कि अगली बार मुंबई आये तो मिलना मुझसे एक बार...अब तो वैसे भी हम थे बेरोजगार तो मनस्वी भाई से मिलने के प्लान के साथ साथ वापस ज़रा कार्टूनिंग करने का भी प्लान बनाया और बस मस्ती में आ के हमने अपनी नयी tablet पर कुछ स्केच कर डाले और उन्हें पोस्ट कर दिया फेसबुक पर, अब इसे संयोग कहिये या विधि का विधान उसी रोज़ पहले उस कार्टून पर मनस्वी भाई ने एक कमेन्ट किया और फिर उनका फ़ोन आ गया और उन्होंने मुझे मिलने बुलाया राजश्री के ऑफिस. राजश्री फिल्म्स?? मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ कि आखिर ये हो क्या रहा है. बस आनन फानन में मनस्वी भाई से मुलाकात की तो पता चला कि वो राजश्री के लिए एक फिल्म डायरेक्ट करनेवाले हैं जिसमें उनका हीरो एक कार्टूनिस्ट है, एक सीधी सच्ची कहानी थी उनकी और बस वो सुनते ही मैं एक बार फिर वापस लौट आया था कार्टूनिंग की ओर.
मेरी एक मुलाक़ात कराई गयी राजकुमार बडजात्या जी से जो फिल्म के निर्माता और राजश्री के सर्वेसर्वा हैं. राज जी से हुई मुलाक़ात मैं भूल नहीं सकता उन्होंने कुछ ही मिनटों में मेरी पूरी जानकारी ले ली ये ही नहीं उन्होंने मुझसे उन सारे शहरों के छविग्रहों का भी विस्तृत हाल ले लिया जिन शहरों में मेरा आना जाना रहा है...उनको ना सिर्फ हर छोटे बड़े शहर की हर टॉकीज़ का नाम याद था बल्कि उन्हें वहाँ चल रही फिल्मों तक की जानकारी थी...ऐसे sharp लोग आपको कभी कभी ही मिलते हैं और मेरे लिए ये मुलाक़ात अविस्मर्णीय इसलिए भी रहेगी कि उड़ीसा के जिस छोटे से गाँव में मेरा जन्म हुआ है, जिसकी जानकारी मुझे लोगों को बहुत सारा भूगोल समझा कर देनी पड़ती है राज जी ने उसका नाम सुनते ही आस पास के कई और छोटे गाँव के नाम मुझे गिना दिए साथ ही मुझे ये हिदायत भी मिली कि हालांकि उनका हीरो कार्टूनिस्ट है पर वो एक सीधा सच्चा इंसान है इसलिए उसके कार्टून्स किसी कि हंसी उड़ाने के लिए नहीं होंगे ना ही वो किसी के नैन - नक्श बिगाड़ेगा, आपके सारे कार्टून्स प्यारे और सबको गुदगुदानेवाले हो व्यंग्यात्मक या कटाक्षवाले बिलकुल ना हो. उन्होंने बासु chatterjee का उदाहरण देते हुए मुझे बताया कि बासु द खुद एक कार्टूनिस्ट थे और उन्होंने राजश्री के लिए काफी फिल्में बनाई हैं और उनकी सारी फिल्मों का बेस होता था सीधा सरल हास्य और मेरे कार्टून्स में वो नज़र आना चाहिए.
उनसे मिल कर मैं जैसे ही बाहर निकला मनस्वी भाई ने मेरी मुलाक़ात सूरज बडजात्या जी से करवाई और जैसे ही सूरज जी अपने ऑफिस में घुसे... मनस्वी भाई ने मेरी टांग खींचते हुए कहा राजश्री में कोई तेरी तरह हाफ चड्डी में नहीं आता...मैंने हाफ पेंट पहनी हुई थी...और इसके बाद मैं जितनी बार राजश्री पहुंचा शायद मैं हर बार हाफपेंट ही पहने हुए था...क्योंकि जब एक बार गलती से मैं जींस पहने हुए ऑफिस पहुँच गया तो कुछ लोगों ने मुझे रोक कर पूछ लिया कि आज क्या कुछ ख़ास बात है? आप पूरे कपड़ों में हैं.

अब तक मनस्वी भाई की ब्रीफ के हिसाब से मैंने कार्टून बनाने शुरू कर दिए थे, और अखबारों के लिए कार्टून बनाने और फिल्म के लिए कार्टून बनाने में जो फर्क होते हैं वो मैं समझने लगा था - जो स्ट्रोक्स चित्र के छोटे होने पर उसकी खूबसूरती बढ़ा सकते हैं वो फिल्म के सेट में दीवारों पर अगर सही ना लगे तो पूरा लुक गड़बड़ हो सकता है.
मनस्वी भाई ने फिल्म के कार्टूनिस्ट हीरो साहिल के घर कि एक कल्पना की थी कि वहाँ हर दीवार पर कार्टून होंगे - मुझे सेट का नक्षा दे दिया गया और दीवारों के डाईमेंशन को ध्यान में रख कर मैंने कार्टून बनाने शुरू कर दिए और ये कार्टून करते करते मुझे ध्यान में आया वो कार्टून जो मैंने भिलाई में रहते हुए अपने दोस्त बंटी की लाईब्ररी में बनाया था - उसकी लाईब्रेरी के एक प्लग पॉइंट में कर्रेंट आ जाया करता था लोगो को उससे दूर रखने के लिए मैंने उस प्लग पॉइंट के सामने एक बिजली का झटका खाते इंसान का कार्टून बनाया था बस वोही कार्टून मैंने साहिल के घर के लिए भी बना दिया - ये कार्टून सूरज जी को भी बड़ा पसंद आया और ये कार्टून फिल्म में भी कई बार नज़र आता है.

कहानी में ट्विस्ट तब आया जब हम सेट पर पहुंचे - अब सेट नक़्शे से काफी अलग हो चुका था और सेट के लिए बनाये मेरे कुछ कार्टून यहाँ इस्तेमाल नहीं हो सकते थे...शूट बड़ी जल्दी शुरू होनी थी और वक़्त था बहुत कम...ऐसे में जब सेट के एक हिस्से में एक बड़ी अलमारी रखी गयी और उसके ऊपर के खाली हिस्से के लिए मुझे कार्टून बनाने को कहा गया तो एक मिनट के लिए मैं सोच में पड़ गया की उतने ऊपर क्या बनाया जाए और अचानक ख्याल आया कि इतने ऊपर तो एक ही इंसान बैठ सकता है - साम्भा! बस मैंने तुरंत स्व. मैक मोहन का एक केरीकेचर किया और उसे वहाँ बिठा दिया.
सबको ये आईडिया मजेदार लगा. जब बात आई सेट पर ये कार्टून्स पैंट करवाने की तो ये मेरे लिए ज़रा दुविधा भरा काम था, ड्राईंग बोर्ड पर कार्टून बनाना एक बात है और दीवारों पर उसे पैंट करना अलग. खैर आर्ट डायरेक्टर ने मुझे दो पेंटर्स दिलाये जो मेरे कार्टून्स उन दीवारों पर पेंट करेंगे, मैंने राहत की सांस कुछ जल्दी ले ली थी क्योंकि इन पैन्टेर्स को कार्टून समझाने के अलावा ये भी समझाना पड़ता था की कुछ लाईनों को उन्हें सिर्फ कॉपी ही नहीं करना ये भी समझना है कि वो वहाँ हैं किसलिए खैर ये पूरा काम निपटने के बाद अगले बाकी कार्टून्स मुझे घर पर ही बनाने थे. और एक एक करके साहिल की पोर्टफोलियो स्केचबुक (जिसमें काफी कार्टून्स मेरे अपने पोर्टफोलियो के थे), उसका विजिटिंग कार्ड, ऑफिस कार्टून्स, फैक्ट्री में इस्तेमाल होने वाले सेफ्टी कार्टून्स, साहिल की कॉमिक स्ट्रिप वगैरह सैकड़ों कार्टून्स मैंने बनाये - मैं एक बार फिर पूर्णकालिक कार्टूनिस्ट बन गया था...साथ ही फिल्म के स्पेशल एफ्फेक्ट्स के लिए भी मैंने थोड़ी storyboarding की जो अपने आप में काफी मजेदार सा अनुभव था. इन कार्टून्स को करते वक़्त ये ध्यान देना भी ज़रूरी था की इनमें से कई कार्टून फिल्म में एक सेकंड से भी कम समय के लिए नज़र आनेवाले थे, इसलिए उनको बिलकुल सिम्पल रखना ज़रूरी था मगर चेलेंज ये था की सिम्पल होने के बाद भी उनमें कुछ ऐसा हो जो लोगों को याद रह जाए...साथ ही हर कार्टून में साहिल का सीधा सादा केरेक्टर नज़र आये... सबसे ज्यादा मुश्किल था अमृता राव के स्केच बनाना क्योंकि ज़रा सी भी गड़बड़ से उनका चेहरा बिगड़ सकता था पर किसी तरह कई ऑप्शन स्केच करने के बाद हमने उनमें से कुछ एक को चुना...और जो ऑप्शन हमने चुने थे मुझे उनके कुछ वर्क इन प्रोग्रेस ऑप्शन बनाने थे ताकि हम साहिल को वो चित्र स्टेप बाई स्टेप बनाते हुए दिखा सकें...ऐसे ही फिल्म के पोस्टर और मार्केटिंग के लिए भी मैंने कई पॉकेट कार्टून और कार्टून स्ट्रिप्स बनाई पर अब मैंने अपने कार्टून्स में ज़रा सी डिटेल डालने के लिए मुक्त था क्योंकि ये कार्टून प्रिंट में इस्तेमाल होनेवाले थे.

खैर फिल्म पूरी होते ही मनस्वी भाई ने मुझे उसके प्रीव्यू के लिए इनवाईट भेजा और मैं पापा जी को ले कर फिल्म देखने पहुंचा. उनको फिल्म इतनी ज्यादा पसंद आई कि वो अब तक इसे दो - तीन बार देख चुके हैं और मज़े की बात ये है कि अब तक उन्होंने मेरे कार्टूनों के बारे में कुछ भी नहीं कहा है हालांकि फिल्म के डाईलोगस के बारे में वो एक लम्बा ब्लॉग लिख चुके हैं...फिल्म के एंड क्रेडिट में मेरा नाम देख कर उनके चेहरे पर जो ख़ुशी की लहर आई मेरे लिए पापा जी की वो ख़ुशी ही इस फिल्म के लिए मेरा सच्चा पारिश्रमिक है - और इस पारिश्रमिक पर कोई टैक्स डिडक्शन नहीं होनेवाला... इसके बाद दूसरी बार ख़ुशी हुई स्क्रीन Magazine में लव यु मी.कलाकार की समीक्षा पढ़ते वक़्त जिसकी आखिरी लाइन में लिखा था - Cartoons shown in the film are excellent.

ना चाहते हुए भी राह में मेरी मुलाक़ात उससे हो ही गयी जिसे मैं इतने समय से टालता आया था - कार्टूनिंग! और इस कहानी का अंत भी मैं मास्टर उगवे के कथन से ही करना चाहूँगा - There are no accidents! न मेरा कार्टूनिंग छोड़ना कोई एक्सीडेंट था न वापस आना, कुछ चीज़ें बस आपको करनी पड़ती है और शायद मेरे लिए वो 'कुछ चीज़' है...कार्टूनिंग.

Some cartoons from Love U...Mr.Kalakaar
























Tuesday, March 29, 2011

Chitrakatha Teasers

Guys,

Finally Chitrakatha is taking its baby steps towards completion, and here are a few teasers that we released on our facebook page - Would love to get your feedback:









-Alok

Sunday, March 6, 2011

The Reflectors of life


There is this strange resemblance between created reality and real life. (By 'Created reality' here, I mean any form of make believe story telling – a simple story narration, a comic book or lets go for a better example – Film shooting. If you are present at the location of a shoot then no amount of post production can change your perception of how the actual location looked like and the number of wires and Reflectors s kept haphazardly here and there. If you have experienced it first hand the set will remain a set for you and even though you will be seeing the most beautiful take aptly edited on the screen, the memory of numerous other wrong takes will dominate your mind. Enjoying the final scene becomes a difficult task after that. Its difficult to cut away from the memories and let go of them to enjoy the final cut. Personally, I simply love the procedure of making something because the end product – well... we all know it is a mere amalgamation of everything that was worth making it to the cut.

Likewise, real life memories also operate on more or less the same rule. An incident from your life (narrated in any form) will look like a final cut on the screen to me and it will be enjoyable as if its a fictional account of your past, on the other hand you while narrating it are actually hitting a refresh button in your memory and seeing that scene again – with all its wires and Reflectors s. Enjoyable for you or not? That I'll leave up to the genre of your memory – but for me it definitely was. Why? Because not only I was unaware of 'the Reflectors s' of your life – additional surroundings, your emotional/physical/at times financial state at that specific point in time but being not present at the 'moment' also makes me look at your memory at a macro level and enjoy the final cut of your story. Guess thats what makes a memoir fun to read, as a school boy, I remember reading Dale Carnegie's struggle and used to wonder how awesome his journey would've been – traveling in carriage trains, working in farms, going to a big city with big dreams and spending years of rejection before making it big. Yes it all sounds interesting because we will never be able to see the Reflectors s that were around him while he was going thru this classical hero's journey. That remains with the person who experienced it first hand.

At times when things are simply out of control and world starts looking like a gloomy stage do we try to cut-off these additional Reflectors s and those clumsy wires on the floor, those bad takes, those silly bloopers, just to come out of the set and start looking at the final cut? Because final cuts always show – Its not the failure but the final product that counts and in the end, everything falls in place.

Sunday, December 26, 2010

Questions...

Well I don't think I should be blogging right now, because I still have one more write up to finish before I hit the sack, but why I am not doing that?? Why am I wasting my time writing a blog entry which I am sure not many will read... I really don't know... There are many things that we do but we don't know why we do them... and then there are things we know - we have to do! and no matter whether you want them or not you do them coz you ought to do them...well these are the things you do so that one day you might get to do what you *really* want to do... Sounds confusing, well the actual scenario is even more confusing...trust me - Quitting from my job some 18 months back was a risk that I had to take because I wanted to work on my documentary independently...

Independence like many other words is one really tricky word, you will never get to know what it *actually* means... everytime you want to get independent (or indie as they call it) you realize you have to buy your independence...and to buy it you have to earn and in order to earn you have to sell your independence... A vicious cycle I tell you... Is this really all worth it?? I don't know... but I am trying to find an answer...

I am still trying to figure out why I started writing this entry...and what were the thoughts that swarmed my mind when out of impulsion I just opened up the blog and just wrote down these lines...

Wish you all a very Happy Festive Season and a Super Duper New Year!

PS. I might try to come back and write a longer post soon...before this year ends...

Sunday, September 5, 2010

एक मुट्ठी आसमान...और एक नॉन-कमर्शियल ब्रेक

यायावर की डायरी के पन्ने काफी वक़्त से खाली पड़े थे...कभी वक़्त नहीं था तो कभी हम नहीं थे...ग्वालियर से लौटे करीब एक हफ्ता होने को आया..और अचानक आज डिजीकैम देखा तो ये तस्वीर दिखी...जो वहाँ रहते हुए अपनी खिड़की के बाहर चहचहाती चिड़ियों की आवाज़ सुन कर खींची थी...
बड़े वक़्त के बाद धूप देखी थी...बड़े वक़्त के बाद सांझ के ढलते सूरज को देखा था और उसे देख कलाई पर बंधी घडी पर वक़्त देखने का ख्याल नहीं था...मन में ऐसा कुछ भी नहीं था जो कहने का मन था...बस कुछ देर वहीँ खड़े रह कर चिड़ियों को चहचहाते देखता रहा...आसमान रंग बदलता रहा और मैं एक अनजान शहर में हो कर भी इन चिर-परिचित नजारों में वो टटोलता रहा जो ना जाने कहाँ पीछे छूट गया है...आसमान की ऊंचाइयों को नापते सपनों के बीच अपरिचित सी परिचित ज़मीन पर थमें कदमों का ये नॉन-कमर्शियल ब्रेक भी सुकून दे जाता है कभी कभी...वरना तो हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमान...

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